जीविका दीदी ( प्रभा देवी): उम्मीद की नई किरण...
बिहार के औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड में एक छोटा सा गांव है खाखरा, और इसी गांव के एक टोले, तेलिया डीह, में रहती हैं प्रभा देवी। प्रभा देवी एक साधारण महिला हैं, जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखती हैं और जिनकी जिंदगी गरीबी के अंधेरे में डूबी हुई थी। उनके पति की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, जिससे वे कोई काम नहीं कर पाते थे। घर में तीन बेटियां थीं और उन्हें पालना-पोसना, पढ़ाना-लिखाना और फिर उनकी शादी करना, ये सारी चिंताएं प्रभा के दिल को हमेशा कचोटती रहती थीं।
उनकी गरीबी इतनी थी कि पेट भर खाना भी मुश्किल से मिल पाता था। वे हर दिन इस चिंता में जीती थीं कि भविष्य में क्या होगा? अपनी बेटियों की पढ़ाई और शादी का खर्च कैसे उठाएंगी? गरीबी का यह बोझ उनके कंधों पर बहुत भारी था। लेकिन, कहते हैं न कि जब एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है।
लगभग पांच साल पहले, प्रभा देवी के जीवन में एक उम्मीद की किरण बनकर आई 'जीविका योजना'। उन्होंने इस योजना के तहत चलाए जा रहे एक स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) की सदस्यता ली। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। समूह की बैठकें, आपसी बातचीत और सहयोग ने उन्हें एक नई दिशा दिखाई।
इसके बाद, 'सतत जीविकोपार्जन योजना' (SJY) के माध्यम से प्रभा देवी का चयन एक 'अत्यंत गरीब दीदी' के रूप में हुआ। यह चयन उनके लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी थी। इस योजना के तहत, उन्हें अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए 37,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिली। इसके अलावा, उन्होंने अपने समूह से भी 3,000 रुपये का छोटा कर्ज लिया। इन पैसों को मिलाकर, साल 2023 में उन्होंने अपने गांव में ही एक छोटी सी राशन की दुकान खोली।
शुरुआत में, दुकान चलाना आसान नहीं था, लेकिन प्रभा देवी के पास दृढ़ संकल्प और जीविका समूह का साथ था। जीविका की अन्य दीदियों ने उनका भरपूर साथ दिया। उन्होंने प्रभा की दुकान से ही राशन और अन्य जरूरी सामान खरीदना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। प्रभा देवी की मेहनत रंग लाई और उनकी दुकान चल निकली।
आज, प्रभा देवी की मासिक आय 5 से 6 हजार रुपये तक हो जाती है और उनकी दुकान की हर दिन की बिक्री 1000 से 1500 रुपये तक होती है। इस आमदनी से उनके परिवार का भरण-पोषण अब बेहतर तरीके से हो रहा है। उन्होंने अपनी दो बेटियों की शादी भी कर दी है और तीसरी बेटी की पढ़ाई जारी है। जो चिंताएं कभी उनके मन में हमेशा बनी रहती थीं, अब वे दूर हो चुकी हैं।
प्रभा देवी अपनी सफलता का पूरा श्रेय जीविका योजना और अपने समूह को देती हैं। वे न केवल अपने व्यवसाय को बखूबी चला रही हैं, बल्कि अपने समूह का संचालन भी अच्छे से करती हैं। समूह की बैठकों में वे नियमित रूप से बचत करती हैं और वित्तीय प्रबंधन के बारे में भी काफी कुछ सीखा है। उन्होंने एक बहुत अच्छी आदत डाली है – वे हर दिन अपनी कमाई में से 20 रुपये एक अलग डब्बे में रखती हैं और बाद में इस राशि को अपने बैंक खाते में जमा करती हैं या फिर अपने व्यवसाय में फिर से निवेश कर देती हैं। उनका व्यक्तिगत बैंक खाता रावल बिगहा के ग्रामीण बैंक में है, और बैंक भी उनकी नियमित बचत को देखते हुए उन्हें भविष्य में आर्थिक मदद देने के लिए तैयार है।
प्रभा देवी की इस दुकान को चलाने में उनके पति और छोटी बेटी भी उनका साथ देते हैं। योजना के एमआरपी (MRP - Master Resource Person) भी समय-समय पर आकर उनका मार्गदर्शन करते हैं और हिसाब-किताब की जांच करते हैं, ताकि उनका व्यवसाय सही दिशा में आगे बढ़ता रहे। उनकी लगन और सफलता को देखते हुए, उन्हें दूसरी किस्त के रूप में करीब 40,000 रुपये की मदद के लिए आवेदन भी जीविका कार्यालय में जमा किया जा चुका है।
अपने व्यवसाय को और बेहतर तरीके से समझने के लिए प्रभा देवी को 'CBED' (Community Based Enterprise Development) विषय पर चार दिन का प्रशिक्षण भी मिला है। जीविका के कार्यकर्ता समय-समय पर उनकी काउंसलिंग भी करते रहते हैं, जिससे वे सही निर्णय ले सकें।
प्रभा देवी की कहानी यह दर्शाती है कि अगर किसी को सही अवसर और थोड़ा सा सहयोग मिले, तो वह गरीबी की जंजीरों को तोड़कर खुद अपनी किस्मत लिख सकता है। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि लाखों महिलाओं की है, जो जीविका जैसी योजनाओं के माध्यम से अपने सपनों को सच कर रही हैं। प्रभा देवी ने साबित कर दिया कि गरीबी कोई अभिशाप नहीं है, बल्कि एक चुनौती है जिसे साहस और मेहनत से पार किया जा सकता है।
इस कहानी से संबंधित रोचक सवाल:
अगर प्रभा देवी की जगह आप होते और आपको 'सतत जीविकोपार्जन योजना' से 37,000 रुपये मिलते, तो आप राशन की दुकान के अलावा और कौन-सा व्यवसाय शुरू करने के बारे में सोचते, जिससे आपकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके?
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