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बिहार के गाँवों में ख़ामोश क्रांति: 'दीदी का अधिकार केंद्र' की 5 चौंकाने वाली बातें जो ग्रामीण महिलाओं का जीवन बदल रही हैं...

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  बिहार के ग्रामीण अंचलों में पिछले कुछ दशकों के दौरान सामाजिक और आर्थिक धरातल पर एक युगांतरकारी परिवर्तन देखा गया है। बिहार राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (BRLPS) यानी 'जीविका' के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक स्वावलंबन तो दिया, लेकिन सामाजिक ताने-बाने में गहराई तक रची-बसी चुनौतियाँ जस की तस बनी रहीं। घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बाल विवाह, संपत्ति विवाद और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जटिल प्रक्रियाएँ महिलाओं के सर्वांगीण विकास के मार्ग में निरंतर रोड़ा अटकाती रहीं। गंभीर सामाजिक और कानूनी संकटों का सामना करने के बावजूद गाँव की साधारण महिलाएँ पुलिस स्टेशन, ब्लॉक कार्यालय या कोर्ट-कचहरी की चौखट तक जाने से कतराती थीं। इसका मूल कारण था — किसी भरोसेमंद सहयोगी, मार्गदर्शक या सुरक्षित वातावरण का अभाव। इस विकट परिस्थिति के स्थायी समाधान के रूप में जीविका द्वारा स्थापित 'दीदी का अधिकार केंद्र' एक ऐसा संबल बनकर उभरा है, जहाँ महिलाओं को न केवल सुलभ न्याय का भरोसा मिलता है, बल्कि उनके स्वाभिमान और सामाजिक अधिकारों को नई बुलंद आवाज़ भी मिल...

🌿 जीविका के 20 साल बेमिसाल…

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बिहार की ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता से गांवों के कायाकल्प तक की ऐतिहासिक यात्रा… “जब महिलाएं संगठित होती हैं, तो परिवार बदलते हैं। जब परिवार बदलते हैं, तो गांव बदलते हैं। और जब गांव बदलते हैं, तो पूरा बिहार बदल सकता है।” 2 अक्टूबर 2026 बिहार के ग्रामीण विकास के इतिहास में एक विशेष दिन है। आज से ठीक 20 वर्ष पहले, 2 अक्टूबर 2006 को बिहार में ग्रामीण गरीब परिवारों, विशेषकर महिलाओं को संगठित कर उनके सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में जीविका ( JEEVIKA ) की यात्रा शुरू हुई। बीस वर्षों की यह यात्रा केवल किसी सरकारी कार्यक्रम के विस्तार की कहानी नहीं है। यह बिहार के गांवों में पैदा हुए आत्मविश्वास, सामूहिकता, नेतृत्व और आजीविका के नए अवसरों की कहानी है। आज जीविका की पहचान केवल स्वयं सहायता समूहों तक सीमित नहीं है। यह महिला सशक्तीकरण, वित्तीय समावेशन, आजीविका संवर्धन, सामाजिक विकास, सरकारी योजनाओं की पहुंच और सामुदायिक संस्थाओं के मजबूत नेटवर्क के रूप में बिहार की एक महत्वपूर्ण पहचान बन चुकी है। 🌱 एक समूह से शुरू हुई बड़ी कहानी जीविका की सबसे बड़ी ताकत है—स्वयं सहायता समूह (...

अंधेरे से उजाले की ओर: संगीता देवी की अद्भुत उड़ान – जीविका से मिली नई पहचान!...

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बिहार के औरंगाबाद जिले के पीरोठा ग्राम पंचायत, कुरमाहा प्रखंड औरंगाबाद की माटी में पली-बढ़ी संगीता देवी, एक ऐसी साधारण महिला हैं, जिनकी कहानी आज लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है। एक समय था, जब उनका जीवन रोजमर्रा के संघर्षों से भरा था। पति, श्री समरेंद्र कुमार, गाँव में एक छोटी सी फोटोकॉपी और सीएसपी (ग्राहक सेवा केंद्र) की दुकान चलाकर जैसे-तैसे परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे। 'अच्छी आर्थिक स्थिति' उनके लिए एक दूर का सपना थी। जीवन की गाड़ी खींचने के लिए हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता था। पर कहते हैं न, हर अंधेरी रात के बाद एक सुनहरी सुबह ज़रूर आती है। संगीता देवी के जीवन में यह बदलाव तब आया, जब उन्हें 'जीविका' (बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी) द्वारा समूह गठन की पहल के बारे में पता चला। उन्हें यह जानकर रोमांच हुआ कि यह संस्था न केवल समूह बनाती है, बल्कि लोगों को रोजगार सृजन के लिए प्रेरित कर आर्थिक स्वावलंबन की राह दिखाती है। यह उनके लिए एक एडवेंचरस यात्रा का पहला कदम था। आरती जीविका स्वयं सहायता समूह: उम्मीद की नई किरण... साल 2021, संगीता द...

कुसुम देवी: संघर्ष से सफलता की ओर – एक जीविका समूह की प्रेरक कहानी...

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बिहार के औरंगाबाद जिले की पीरोठा ग्राम पंचायत, कुरमाहा प्रखंड की रहने वाली कुसुम देवी, उन लाखों साधारण महिलाओं में से एक थीं, जिनका जीवन गरीबी और संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था। उनके पति, अनुरोध मेहता, गांव में मजदूरी करके किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते थे। आर्थिक तंगी के कारण जीवन की गाड़ी खींचना एक बड़ी चुनौती थी। मगर, कहते हैं न, जब हौसले बुलंद हों तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती। कुसुम देवी ने अपने जीवन की दशा और दिशा बदलने का फैसला किया और यह बदलाव आया 'जीविका' (बिहार ग्रामीण आजीविका प्रोत्साहन सोसायटी) के माध्यम से। जीविका से जुड़ाव: एक नई शुरुआत... साल 2020, कुसुम देवी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया, जब उन्हें पता चला कि जीविका द्वारा उनके गांव में स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को संगठित करके रोजगार सृजन और आर्थिक सशक्तिकरण है। बिना देर किए, उन्होंने 'आरती जीविका स्वयं सहायता समूह' की सदस्यता ग्रहण की। समूह में शामिल होने के बाद, उन्होंने समूह के 'पंच सूत्रों' (नियमित बैठक, नियमित बचत, न...

गाँव की पगडंडी से आसमान की उड़ान: शिवानी कुमारी ने बदली रूढ़ियों की तस्वीर...

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औरंगाबाद जिले के एक छोटे से गाँव सरब बीघा की बेटी शिवानी कुमारी की कहानी सिर्फ एक लड़की की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह उन हजारों ग्रामीण युवतियों के लिए आशा, साहस, और सशक्तिकरण की एक जीती-जागती मिसाल है, जो आज भी समाज की पुरानी और संकीर्ण सोच की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। शिवानी ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में पक्का इरादा और अटूट लगन हो, तो गाँव की पगडंडियाँ भी सीधे आसमान की ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं। उनकी यह उपलब्धि एक झटके में उस पुरानी धारणा को तोड़ देती है, जिसमें कहा जाता था कि "बेटियाँ बाहर काम नहीं करतीं" या "गाँव की लड़कियों के लिए कुछ सीमित क्षेत्र ही हैं।" शिवानी ने एयर होस्टेस बनकर, एक ऐसे करियर का चयन किया है जिसे अक्सर बड़े शहरों और विशेष पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है, और इस प्रकार उन्होंने ग्रामीण भारत की युवा शक्ति की असीम क्षमता को उजागर किया है। साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण सफर... शिवानी एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आती हैं, जहाँ बेटियों की शिक्षा और करियर को लेकर अक्सर कई तरह की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ होती हैं। ऐसे माहौल...

तिरंगा जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति: आजीविका और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान..

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     बिहार के औरंगाबाद जिले में, हसपुरा प्रखंड के शांत और हरे-भरे परिदृश्य में एक अनोखी पहल ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में नई ऊर्जा का संचार किया है। यह पहल है राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत स्थापित कम्युनिटी मैनेज्ड ट्रेनिंग सेंटर (CMTC) की, जिसका संचालन तिरंगा जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड की देख-रेख में किया जा रहा है। जून 2024 में शुरू हुआ यह केंद्र, न केवल एक प्रशिक्षण स्थल है, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामुदायिक सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन गया है। एक सपना जो साकार हुआ.. इस केंद्र की स्थापना के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट था - स्वयं सहायता समूह (SHG) की सदस्यों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं को उनके कौशल और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए एक स्थानीय और सुलभ मंच प्रदान करना। अब तक प्रशिक्षण के लिए औरंगाबाद जैसे बड़े शहरों पर निर्भर रहने वाली जीविका दीदियों के लिए यह केंद्र एक वरदान साबित हुआ है। एक समय था जब उन्हें प्रशिक्षण के लिए अपने घर से 60 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय के होटलों में जाना पड़ता था, जो न सिर्फ अस...

जीविका दीदी ( प्रभा देवी): उम्मीद की नई किरण...

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बिहार के औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड में एक छोटा सा गांव है खाखरा, और इसी गांव के एक टोले, तेलिया डीह, में रहती हैं प्रभा देवी। प्रभा देवी एक साधारण महिला हैं, जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखती हैं और जिनकी जिंदगी गरीबी के अंधेरे में डूबी हुई थी। उनके पति की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, जिससे वे कोई काम नहीं कर पाते थे। घर में तीन बेटियां थीं और उन्हें पालना-पोसना, पढ़ाना-लिखाना और फिर उनकी शादी करना, ये सारी चिंताएं प्रभा के दिल को हमेशा कचोटती रहती थीं। उनकी गरीबी इतनी थी कि पेट भर खाना भी मुश्किल से मिल पाता था। वे हर दिन इस चिंता में जीती थीं कि भविष्य में क्या होगा? अपनी बेटियों की पढ़ाई और शादी का खर्च कैसे उठाएंगी? गरीबी का यह बोझ उनके कंधों पर बहुत भारी था। लेकिन, कहते हैं न कि जब एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है। लगभग पांच साल पहले, प्रभा देवी के जीवन में एक उम्मीद की किरण बनकर आई 'जीविका योजना'। उन्होंने इस योजना के तहत चलाए जा रहे एक स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) की सदस्यता ली। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। समूह की बैठकें, आपसी बातची...