बिहार के गाँवों में ख़ामोश क्रांति: 'दीदी का अधिकार केंद्र' की 5 चौंकाने वाली बातें जो ग्रामीण महिलाओं का जीवन बदल रही हैं...
बिहार के ग्रामीण अंचलों में पिछले कुछ दशकों के दौरान सामाजिक और आर्थिक धरातल पर एक युगांतरकारी परिवर्तन देखा गया है। बिहार राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (BRLPS) यानी 'जीविका' के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक स्वावलंबन तो दिया, लेकिन सामाजिक ताने-बाने में गहराई तक रची-बसी चुनौतियाँ जस की तस बनी रहीं। घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बाल विवाह, संपत्ति विवाद और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जटिल प्रक्रियाएँ महिलाओं के सर्वांगीण विकास के मार्ग में निरंतर रोड़ा अटकाती रहीं। गंभीर सामाजिक और कानूनी संकटों का सामना करने के बावजूद गाँव की साधारण महिलाएँ पुलिस स्टेशन, ब्लॉक कार्यालय या कोर्ट-कचहरी की चौखट तक जाने से कतराती थीं। इसका मूल कारण था — किसी भरोसेमंद सहयोगी, मार्गदर्शक या सुरक्षित वातावरण का अभाव। इस विकट परिस्थिति के स्थायी समाधान के रूप में जीविका द्वारा स्थापित 'दीदी का अधिकार केंद्र' एक ऐसा संबल बनकर उभरा है, जहाँ महिलाओं को न केवल सुलभ न्याय का भरोसा मिलता है, बल्कि उनके स्वाभिमान और सामाजिक अधिकारों को नई बुलंद आवाज़ भी मिल...