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गाँव की पगडंडी से आसमान की उड़ान: शिवानी कुमारी ने बदली रूढ़ियों की तस्वीर...

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औरंगाबाद जिले के एक छोटे से गाँव सरब बीघा की बेटी शिवानी कुमारी की कहानी सिर्फ एक लड़की की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह उन हजारों ग्रामीण युवतियों के लिए आशा, साहस, और सशक्तिकरण की एक जीती-जागती मिसाल है, जो आज भी समाज की पुरानी और संकीर्ण सोच की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। शिवानी ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में पक्का इरादा और अटूट लगन हो, तो गाँव की पगडंडियाँ भी सीधे आसमान की ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं। उनकी यह उपलब्धि एक झटके में उस पुरानी धारणा को तोड़ देती है, जिसमें कहा जाता था कि "बेटियाँ बाहर काम नहीं करतीं" या "गाँव की लड़कियों के लिए कुछ सीमित क्षेत्र ही हैं।" शिवानी ने एयर होस्टेस बनकर, एक ऐसे करियर का चयन किया है जिसे अक्सर बड़े शहरों और विशेष पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है, और इस प्रकार उन्होंने ग्रामीण भारत की युवा शक्ति की असीम क्षमता को उजागर किया है। साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण सफर... शिवानी एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आती हैं, जहाँ बेटियों की शिक्षा और करियर को लेकर अक्सर कई तरह की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ होती हैं। ऐसे माहौल...

तिरंगा जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति: आजीविका और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान..

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     बिहार के औरंगाबाद जिले में, हसपुरा प्रखंड के शांत और हरे-भरे परिदृश्य में एक अनोखी पहल ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में नई ऊर्जा का संचार किया है। यह पहल है राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत स्थापित कम्युनिटी मैनेज्ड ट्रेनिंग सेंटर (CMTC) की, जिसका संचालन तिरंगा जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड की देख-रेख में किया जा रहा है। जून 2024 में शुरू हुआ यह केंद्र, न केवल एक प्रशिक्षण स्थल है, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामुदायिक सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन गया है। एक सपना जो साकार हुआ.. इस केंद्र की स्थापना के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट था - स्वयं सहायता समूह (SHG) की सदस्यों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं को उनके कौशल और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए एक स्थानीय और सुलभ मंच प्रदान करना। अब तक प्रशिक्षण के लिए औरंगाबाद जैसे बड़े शहरों पर निर्भर रहने वाली जीविका दीदियों के लिए यह केंद्र एक वरदान साबित हुआ है। एक समय था जब उन्हें प्रशिक्षण के लिए अपने घर से 60 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय के होटलों में जाना पड़ता था, जो न सिर्फ अस...

जीविका दीदी ( प्रभा देवी): उम्मीद की नई किरण...

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बिहार के औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड में एक छोटा सा गांव है खाखरा, और इसी गांव के एक टोले, तेलिया डीह, में रहती हैं प्रभा देवी। प्रभा देवी एक साधारण महिला हैं, जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखती हैं और जिनकी जिंदगी गरीबी के अंधेरे में डूबी हुई थी। उनके पति की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, जिससे वे कोई काम नहीं कर पाते थे। घर में तीन बेटियां थीं और उन्हें पालना-पोसना, पढ़ाना-लिखाना और फिर उनकी शादी करना, ये सारी चिंताएं प्रभा के दिल को हमेशा कचोटती रहती थीं। उनकी गरीबी इतनी थी कि पेट भर खाना भी मुश्किल से मिल पाता था। वे हर दिन इस चिंता में जीती थीं कि भविष्य में क्या होगा? अपनी बेटियों की पढ़ाई और शादी का खर्च कैसे उठाएंगी? गरीबी का यह बोझ उनके कंधों पर बहुत भारी था। लेकिन, कहते हैं न कि जब एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है। लगभग पांच साल पहले, प्रभा देवी के जीवन में एक उम्मीद की किरण बनकर आई 'जीविका योजना'। उन्होंने इस योजना के तहत चलाए जा रहे एक स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) की सदस्यता ली। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। समूह की बैठकें, आपसी बातची...

कमलादेवी की सफलता की कहानी: छोटी शुरुआत से बड़े सपनों तक...

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       कमलादेवी, औरंगाबाद जिले के करमा भगवान गाँव की एक साधारण महिला थीं। उनकी कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है, जिसमें कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और एक छोटे से अवसर ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। आज से पाँच साल पहले, कमलदेवी की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पास अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे, और भविष्य को लेकर उनकी चिंताएं बढ़ती जा रही थीं। लेकिन तभी, उनके जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ—वह पराग समूह नामक एक स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) से जुड़ीं। यह सिर्फ एक समूह नहीं था, बल्कि उम्मीद की एक किरण थी। पराग समूह का जुड़ाव वसुंधरा जीविका महिला ग्राम संगठन से था, जो आगे चलकर जागृति जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ से जुड़ा। इस नेटवर्क ने कमलदेवी को न केवल एक पहचान दी, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त होने का रास्ता भी दिखाया। समूह में शामिल होने के बाद, कमलदेवी ने नियमित रूप से अपनी छोटी-छोटी बचत शुरू की। यह एक ऐसा कदम था जिसने उनके अंदर आत्मविश्वास की नींव रखी। समूह के सुचारू संचालन के बाद, जीविका और बैंक से उनके समूह को कुल ₹5...

🎓 सीखने की कोई उम्र नहीं: 68 साल की रानी एन टी की प्रेरणादायक कहानी...

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अक्सर लोग कहते हैं कि पढ़ाई-लिखाई और नई शुरुआत केवल युवाओं के लिए होती है। लेकिन कुछ लोग अपने जुनून और हौसले से इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर देते हैं। तमिलनाडु के कोयंबटूर की रहने वाली 68 वर्षीय रानी एन टी ऐसी ही एक मिसाल हैं, जिन्होंने यह दिखा दिया कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती। रानी ने 68 साल की उम्र में 12वीं की परीक्षा पास करके यह साबित किया कि अगर मन में सच्ची लगन हो, तो जीवन का हर पड़ाव सीखने का अवसर बन सकता है। 📚 अधूरी पढ़ाई का अधूरा सपना रानी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। साल 1972 में उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास कर ली थी। लेकिन उस समय गाँव में आगे की पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं थी। लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज की सोच भी सीमित थी। नतीजा यह हुआ कि रानी को मजबूरन अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। वह कहती हैं – "मैं आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया। गाँव में कॉलेज या इंटरमीडिएट की सुविधा ही नहीं थी।" इसके बाद उनकी शादी हो गई और वे चेन्नई से होते हुए कोयंबटूर आ गईं। शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश म...

रिंकू देवी की प्रेरक यात्रा : संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर...

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ग्रामीण जीवन अक्सर कठिनाइयों और संघर्षों से भरा होता है। लेकिन इन्हीं कठिनाइयों के बीच कुछ लोग अपने साहस और आत्मविश्वास के दम पर ऐसी मिसाल पेश कर जाते हैं, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाती है। रफीगंज प्रखंड के चौबड़ा पंचायत के बड़गांव गाँव की निवासी रिंकू देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी एक गरीब महिला, जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए दिन-रात जूझ रही थी, आज एक सफल दुकानदार बनकर न सिर्फ अपने बच्चों का भविष्य संवार रही हैं, बल्कि पूरे गाँव की महिलाओं के लिए प्रेरणा भी बन गई हैं। संघर्षों की शुरुआत रिंकू देवी का जीवन हमेशा से आसान नहीं था। उनके पति चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े थे, जिससे परिवार का गुजर-बसर ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन वर्ष 2019 में बीमारी के कारण पति का असमय निधन हो गया। यह घटना रिंकू देवी के जीवन में गहरा अंधकार लेकर आई। पति के निधन के बाद उनके सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की चुनौतियाँ खड़ी हो गईं। घर में कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं बचा था। बच्चों की पढ़ाई, भोजन और घर का खर्च चलाना बहुत कठिन हो गया। समाज में भी उन्हें विधवा होने के कारण अनेक तरह की चुनौतियों का स...

सुनीता देवी की प्रेरक यात्रा: स्वयं सहायता समूह से सशक्तिकरण की ओर...

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  बिहार के औरंगाबाद जिले के हसपुरा प्रखंड के निलकोठी गाँव की साधारण महिला सुनीता देवी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि संघर्ष चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर आत्मविश्वास और सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो जीवन में सकारात्मक बदलाव निश्चित है। संघर्षों से भरा जीवन सुनीता देवी का जीवन कभी आसान नहीं था। उनके पति राजमिस्त्री का काम करते थे, लेकिन गाँव में पर्याप्त काम न मिलने की वजह से आय बहुत सीमित थी। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी, बच्चों की पढ़ाई मुश्किल से चल रही थी और घर के खर्च पूरे करना भी चुनौती बन गया था। इस अभावग्रस्त जीवन में भविष्य की कोई रोशनी नजर नहीं आती थी। स्वयं सहायता समूह से जुड़ाव: एक नया अध्याय वर्ष 2016 सुनीता देवी के जीवन में उम्मीद की किरण लेकर आया। उन्हें अपने गाँव के राखी जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का अवसर मिला। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें न सिर्फ आर्थिक सहारा मिला, बल्कि आत्मविश्वास और हिम्मत भी मिली। समूह की अन्य महिलाओं ने उन्हें छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। सुनीता ने 20,000 रुप...

देवरानी देवी: आत्मनिर्भरता की राह पर एक प्रेरणादायी यात्रा...

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  जीवन में संघर्ष हर किसी के हिस्से आता है, लेकिन वही लोग इतिहास बनाते हैं जो उन संघर्षों को अवसर में बदल देते हैं। औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मलहद पंचायत की रहने वाली देवरानी देवी ऐसी ही एक महिला हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बदली, बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं के लिए भी एक प्रेरणा बन गईं। शुरुआत: समूह से जुड़ाव और नई उम्मीद वर्ष 2021 में, देवरानी देवी दुल्हन जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें एक नया आत्मविश्वास और सामूहिक शक्ति का अहसास हुआ। समूह की बैठकों और गतिविधियों में वे सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। उनके पति, निरंजन प्रसाद, खेती-बारी करते थे। खेती से होने वाली थोड़ी बहुत आय से ही परिवार का गुजारा होता था। लेकिन यह आमदनी इतनी कम थी कि घर की सभी ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल हो जाता था। ऐसे में देवरानी देवी ने सोचा कि उन्हें भी परिवार की आर्थिक मजबूती के लिए कुछ करना चाहिए। नई राह की तलाश मन में आत्मनिर्भर बनने का सपना था, लेकिन पूंजी की कमी सबसे बड़ी बाधा थी। उन्होंने अपनी समस्या को समूह की बैठक में रखा।...

विधवा माँ सुमित्रा देवी: अंधकार से उजाले की ओर एक अदम्य यात्रा...

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  कहते हैं कि इंसान का हौसला उसकी सबसे बड़ी ताक़त होता है। जब जीवन हमें कठिनाइयों से परखता है, तब वही हौसला हमें मंज़िल तक पहुँचाता है। औरंगाबाद जिले के दादर गाँव की रहने वाली सुमित्रा देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह कहानी केवल एक महिला की संघर्ष गाथा नहीं है, बल्कि उस अडिग जज़्बे की मिसाल है, जो समाज में हर उस व्यक्ति को प्रेरित करता है, जो जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा है। संघर्षों से भरा जीवन सुमित्रा देवी की ज़िंदगी कभी आसान नहीं रही। पति की असमय मृत्यु ने मानो उनकी दुनिया ही उजाड़ दी। सात बच्चों की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गिरी। गरीबी, सामाजिक ताने-बाने और रोज़मर्रा की मुश्किलों ने उन्हें अंदर तक तोड़ने की कोशिश की। कई दिन ऐसे गुज़रे जब बच्चों को भूखे पेट सोना पड़ा। दो वक्त की रोटी जुटाना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया। बच्चों की पढ़ाई छूट गई क्योंकि माँ के सामने सबसे पहले उनके पेट की आग बुझाने का सवाल था। यह दौर इतना कठिन था कि कोई भी आसानी से हार मान लेता। लेकिन सुमित्रा देवी ने ठान लिया था कि वह अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देंगी। नई राह की तलाश जीवन क...

बेहतर भविष्य और शिक्षा का अधिकार: बारुण प्रखंड का जीविका सामुदायिक पुस्तकालय सह कैरियर विकास केंद्र...

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शिक्षा वह आधार है जिस पर किसी भी बच्चे का भविष्य टिका होता है। लेकिन जब संसाधनों की कमी, उचित मार्गदर्शन का अभाव और अवसरों की दूरी बच्चों के सामने खड़ी हो जाती है, तो उनका सपना अधूरा रह जाता है। औरंगाबाद जिले के बारुण प्रखंड में एक ऐसी ही अनोखी पहल हुई है जिसने इन चुनौतियों को अवसर में बदल दिया है। यह पहल है – “जीविका सामुदायिक पुस्तकालय सह कैरियर विकास केंद्र” , जिसकी स्थापना 13 फरवरी 2023 को बारुण प्रखंड कार्यालय परिसर में की गई। यह केंद्र सिर्फ किताबों का भंडार भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा ज्ञानालय है जिसने ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के भविष्य को नई दिशा दी है। इसकी शुरुआत का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था – स्वयं सहायता समूह (SHG) के सदस्यों के बच्चों को बेहतर शिक्षा, उचित मार्गदर्शन और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना। पुस्तकालय की नींव: सामुदायिक सोच का परिणाम इस पुस्तकालय की देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी आंचल जीविका संकुल स्तरीय संघ (CLF) को दी गई है। इससे यह केंद्र न केवल संस्थागत रूप से सशक्त है, बल्कि समुदाय की सक्रिय भागीदारी से भी जुड़ा हुआ है। पुस्तकालय प्रबंधन के लिए सरिता देवी क...

संघर्ष से सफलता तक: कलावती देवी की प्रेरणादायक कहानी...

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औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड अंतर्गत पश्चिम केतकी पंचायत के चिताबीघा गांव की रहने वाली कलावती देवी की जीवन यात्रा संघर्ष और साहस का अद्भुत उदाहरण है। एक समय था जब उनका परिवार भयंकर संकट से गुजर रहा था। वर्ष 2018 में बीमारी के कारण उनके पति का निधन हो गया। घर में दो छोटी बेटियाँ और कोई भी सहारा देने वाला नहीं था। आर्थिक तंगी इस हद तक बढ़ गई कि परिवार के भरण-पोषण में कठिनाई आने लगी। पति के निधन के बाद कलावती देवी की स्थिति दयनीय हो गई थी। जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाना बेहद मुश्किल लग रहा था। लेकिन इसी कठिन समय में जीविका द्वारा संचालित सतत जीविकोपार्जन योजना (Satat Jeev Koparjan Yojana) उनके जीवन में आशा की किरण बनकर आई। कलावती देवी पहले से ही स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ी हुई थीं, जिसके कारण उन्हें इस योजना से लाभ लेने का अवसर मिला। योजना के तहत उन्हें 80,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। जीविका ने उन्हें यह समझाया कि वही कार्य चुनें जिसमें उनकी रुचि और हुनर है। कलावती देवी को पहले से सिलाई-कढ़ाई का थोड़ा बहुत ज्ञान था। जीविका ने उन्हें इस हुनर को निखारने के लिए प्रशिक...

एक सपना, एक नर्सरी: पूजा कुमारी की 'दीदी की नर्सरी' सफलता की कहानी...

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बिहार के औरंगाबाद जिले में, देव प्रखंड के एक छोटे से गांव, गंजोए नारायणपुर, की फिजाओं में कभी नक्सलियों का खौफ घुला रहता था। यह गांव, पहाड़ियों की तलहटी में बसा, मुख्यधारा से कटा हुआ सा लगता था। मगर इसी मिट्टी में, एक साहसी और मेहनती महिला, पूजा कुमारी ने, अपने जीवन की दिशा बदल दी। उनकी कहानी सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता की गाथा नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय और सामूहिक सहयोग की शक्ति का एक जीवंत प्रमाण है। पूजा कुमारी, एक महादलित समुदाय की महिला, जिनकी आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। किसी तरह इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी कर, वह सिलाई और खेती-बाड़ी करके अपने परिवार का पेट पाल रही थीं। जीवन की मुश्किलें बहुत थीं, लेकिन पूजा के दिल में कुछ बड़ा करने की चाह हमेशा जिंदा रही। इसी चाह ने उन्हें जीविका (BRLPS) द्वारा चलाए जा रहे एक स्वयं सहायता समूह (SHG) से जोड़ा। पाँच साल पहले, साल 2020 में, वह चांदनी जीविका महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनीं। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। जब जीविका ने 'दीदी की नर्सरी' योजना की शुरुआत की, तो पूजा की आँखों में एक नई चमक दिखी। उन्...