कुसुम देवी: संघर्ष से सफलता की ओर – एक जीविका समूह की प्रेरक कहानी...


बिहार के औरंगाबाद जिले की पीरोठा ग्राम पंचायत, कुरमाहा प्रखंड की रहने वाली कुसुम देवी, उन लाखों साधारण महिलाओं में से एक थीं, जिनका जीवन गरीबी और संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था। उनके पति, अनुरोध मेहता, गांव में मजदूरी करके किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते थे। आर्थिक तंगी के कारण जीवन की गाड़ी खींचना एक बड़ी चुनौती थी। मगर, कहते हैं न, जब हौसले बुलंद हों तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती। कुसुम देवी ने अपने जीवन की दशा और दिशा बदलने का फैसला किया और यह बदलाव आया 'जीविका' (बिहार ग्रामीण आजीविका प्रोत्साहन सोसायटी) के माध्यम से।

जीविका से जुड़ाव: एक नई शुरुआत...
साल 2020, कुसुम देवी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया, जब उन्हें पता चला कि जीविका द्वारा उनके गांव में स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को संगठित करके रोजगार सृजन और आर्थिक सशक्तिकरण है। बिना देर किए, उन्होंने 'आरती जीविका स्वयं सहायता समूह' की सदस्यता ग्रहण की। समूह में शामिल होने के बाद, उन्होंने समूह के 'पंच सूत्रों' (नियमित बैठक, नियमित बचत, नियमित ऋण वापसी, नियमित लेखा-जोखा और सामूहिक निर्णय) का पूरी लगन से पालन करना शुरू किया। यह सिर्फ एक सदस्यता नहीं थी, बल्कि एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक आधारशिला थी जिस पर वह अपने सपनों की इमारत खड़ी करने वाली थीं।

उद्यमिता की राह: झाल-मुरही का व्यवसाय...
समूह से जुड़ने के दो साल बाद, कुसुम देवी ने एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने समूह से ₹50,000 की ऋण राशि प्राप्त की। इस पूंजी का उपयोग उन्होंने एक छोटे से व्यवसाय को शुरू करने में किया – घर पर ही 'झाल-मुरही' (मसालेदार फुला हुआ चावल) की दुकान डालना। यह एक साधारण विचार था, लेकिन इसमें बड़ा दम था। जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाने लगी और अच्छी आमदनी होने लगी।
कुसुम देवी की लगन और व्यवसाय की शुरुआती सफलता को देखकर, उनके पति अनुरोध मेहता ने भी उनका पूरा साथ देने का फैसला किया। आमदनी से उन्होंने एक साइकिल खरीदी और गाँव-गाँव, आस-पड़ोस के गांवों में घूमकर झाल-मुरही बेचना शुरू कर दिया। इस साझा प्रयास का फल जल्द ही दिखने लगा; उनकी मासिक आमदनी ₹10,000 से ₹15,000 तक पहुँच गई।

सफलता की उड़ान और परिवार का सहयोग...
कुसुम देवी और अनुरोध मेहता दोनों ने मिलकर इस छोटे से व्यवसाय को एक सफल पारिवारिक उद्यम में बदल दिया। आज, उनके बच्चे भी इस काम में उनका हाथ बंटाते हैं। अनुरोध मेहता गांव में भ्रमण करके झाल-मुरही बेचते हैं, जिससे उनकी पारिवारिक आय अब ₹20,000 से ₹25,000 प्रति माह तक पहुँच गई है। मजदूरी के काम से होने वाली सीमित आय की तुलना में यह एक बहुत बड़ी छलांग थी।
कुसुम देवी अपनी इस सफलता का श्रेय जीविका समूह को देती हैं। उन्होंने कहा, "समूह से पैसे लेकर ही हमने यह रोजगार शुरू किया। आज हम सब मिलकर काम करते हैं और हमारा जीवन बेहतर हुआ है।" उनके पति, अनुरोध मेहता, भी मानते हैं कि अगर उनकी पत्नी समूह से नहीं जुड़ी होतीं, तो शायद वह आज भी मजदूरी ही कर रहे होते और इस रोजगार को शुरू करने का साहस नहीं कर पाते।

सरकारी योजना का लाभ और बड़े सपने...
सफलता की इस यात्रा में, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना (Mukhyamantri Mahila Rojgar Yojana) भी उनके लिए एक संबल बनी। योजना के तहत प्राप्त ₹10,000 की शुरुआती राशि को उन्होंने अपने झाल-मुरही के व्यवसाय में निवेश किया, जिससे उनका व्यवसाय और मजबूत हुआ।
कुसुम देवी के सपने अब और बड़े हो चुके हैं। उनका कहना है कि जब उन्हें इसी योजना के तहत ₹2 लाख की राशि मिलेगी, तो वह अपने झाल-मुरही की दुकान को गांव में ही बड़े स्तर पर स्थापित करेंगी। उनका लक्ष्य है कि उनकी मासिक आमदनी ₹30,000 से ₹40,000 तक पहुँच जाए। वह अपने रोजगार को केवल बढ़ाना ही नहीं चाहतीं, बल्कि अपने पूरे परिवार को इसमें शामिल करके, इसे एक स्थायी और समृद्ध व्यवसाय बनाना चाहती हैं।

संदेश और निष्कर्ष...
कुसुम देवी का मानना है कि स्वयं सहायता समूह एक बहुत ही अच्छी पहल है और हर महिला को इससे जुड़ना चाहिए। उनका दृढ़ मत है कि समूह से जुड़कर महिलाएं आर्थिक रूप से संपन्न हो सकती हैं और उन्हें रोजगार के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा।
कुसुम देवी की यह कहानी जीविका समूह की शक्ति, महिलाओं के अटल हौसले और सामूहिक प्रयास से होने वाले आर्थिक और सामाजिक बदलाव का एक जीवंत प्रमाण है। यह न केवल औरंगाबाद जिले की महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे बिहार और देश की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है कि कैसे एक छोटा सा कदम और सही मार्गदर्शन गरीबी को हराकर समृद्धि के द्वार खोल सकता है।

सवाल:
 जीविका समूह से जुड़कर कुसुम देवी ने ₹50,000 के शुरुआती ऋण से झाल-मुरही का व्यवसाय शुरू किया और आज ₹20,000 तक कमा रही हैं। आपके अनुसार, भारत में ग्रामीण महिलाओं के लिए ₹50,000 की छोटी पूंजी के साथ शुरू किए जा सकने वाले ऐसे और कौन से सबसे सफल और कम जोखिम वाले घरेलू व्यवसाय (Home-Based Businesses) हो सकते हैं जो उनकी आर्थिक आजादी का जरिया बन सकें? अपने विचार कमेंट में बताएं!
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