एक सपना, एक नर्सरी: पूजा कुमारी की 'दीदी की नर्सरी' सफलता की कहानी...
बिहार के औरंगाबाद जिले में, देव प्रखंड के एक छोटे से गांव, गंजोए नारायणपुर, की फिजाओं में कभी नक्सलियों का खौफ घुला रहता था। यह गांव, पहाड़ियों की तलहटी में बसा, मुख्यधारा से कटा हुआ सा लगता था। मगर इसी मिट्टी में, एक साहसी और मेहनती महिला, पूजा कुमारी ने, अपने जीवन की दिशा बदल दी। उनकी कहानी सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता की गाथा नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय और सामूहिक सहयोग की शक्ति का एक जीवंत प्रमाण है।
पूजा कुमारी, एक महादलित समुदाय की महिला, जिनकी आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। किसी तरह इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी कर, वह सिलाई और खेती-बाड़ी करके अपने परिवार का पेट पाल रही थीं। जीवन की मुश्किलें बहुत थीं, लेकिन पूजा के दिल में कुछ बड़ा करने की चाह हमेशा जिंदा रही। इसी चाह ने उन्हें जीविका (BRLPS) द्वारा चलाए जा रहे एक स्वयं सहायता समूह (SHG) से जोड़ा। पाँच साल पहले, साल 2020 में, वह चांदनी जीविका महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनीं। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
जब जीविका ने 'दीदी की नर्सरी' योजना की शुरुआत की, तो पूजा की आँखों में एक नई चमक दिखी। उन्हें लगा कि यह उनके लिए एक अवसर हो सकता है। उनके घर के पास ही उनकी अपनी खाली जमीन थी, और उन्होंने तुरंत इस योजना में अपनी रुचि दिखाई। जीविका और बिहार सरकार के वन विभाग ने मिलकर उनका चयन किया। यह सिर्फ एक चयन नहीं था, बल्कि उन पर दिखाया गया भरोसा था।
साल 2023 में, उन्हें इस नर्सरी को शुरू करने के लिए ₹1,40,000 की आर्थिक सहायता मिली। यह राशि उनके लिए एक वरदान की तरह थी। उन्होंने इस पैसे का उपयोग कर, अपनी खाली पड़ी जमीन पर पौधों की एक छोटी सी दुनिया बना दी। यहाँ उन्होंने आम, अमरूद, कटहल, बकैन, जामुन, आंवला, सागवान और शीशम जैसे विभिन्न प्रकार के पौधों की नर्सरी तैयार की।
पहले साल, यानी 2023 में, पूजा ने 11,000 पौधे वन विभाग को दिए। यह उनके प्रयास का पहला फल था। उनकी मेहनत रंग ला रही थी। अगले साल, 2024 में, उन्होंने 8,500 पौधे वितरित किए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी सफलता 2025 में मिली, जब उन्होंने रिकॉर्ड 18,500 पौधे जीविका समूह के सदस्यों को दिए। इन पौधों की कीमत ₹15 प्रति पौधा तय की गई, जिसका भुगतान उन्हें जीविका और वन विभाग द्वारा नियमित रूप से होता रहा।
यह नर्सरी सिर्फ पौधों का घर नहीं थी, बल्कि पूजा के परिवार की उम्मीदों का नया ठिकाना बन गई थी। 'दीदी की नर्सरी' से अब पूजा को हर साल 2 से 2.5 लाख रुपए तक की आमदनी हो रही है। यह आय उनके जीवन में स्थिरता और खुशहाली लेकर आई है। अब उन्हें अपने परिवार के लिए जीविकोपार्जन की चिंता नहीं रहती, बल्कि वे अपने जीवन को एक बेहतर दिशा दे पा रही हैं।
पूजा अपनी सफलता का श्रेय अकेले नहीं लेतीं। वह बताती हैं कि उनके पति और घर के अन्य सदस्यों का भरपूर सहयोग मिलता है। यह सहयोग ही उनके कार्य को और भी आसान और सफल बनाता है। उनके चेहरे पर मुस्कान और आँखों में संतोष की चमक साफ दिखती है।
आज, पूजा कुमारी अपने गांव की अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। एक छोटे से गांव की साधारण महिला ने, अपने समर्पण और मेहनत से, न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली, बल्कि अपने समुदाय को भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। उनकी 'दीदी की नर्सरी' अब सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि उम्मीद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है।
good job praveen ji
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